मिथिला में एक खास परंपरा है जिसमें डूबते सूरज के साथ ही नहीं, बल्कि कलंकित चांद को भी पूजा जाता है। इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई, यह जानिए।

पटना में, सनातन संस्कृति में प्राकृतिक पूजा का विशेष महत्व है। मिथिला की संस्कृति में भी प्राकृतिक पूजा का महत्व है। यहां लोग जल से लेकर अग्नि और सूर्य से लेकर चंद्रमा तक की पूजा को एक लोकपर्व के रूप में करते हैं। यहां परंपराओं के हिस्से के रूप में डूबते सूरज के साथ ही नहीं, कलंकित चांद को भी पूजने का अनुभव किया जा सकता है।

इसके अलावा, भादों की चौथ के दिन, जब पूरे देश में कलंकित चांद को देखने से रोका जाता है, तो मिथिला में इस दिन लोग चांद को अर्घ्य देते हैं, उसके दर्शन करते हैं, और कलंक मुक्ति की कामना करते हैं। यहां परंपरिक धार्मिक मान्यताओं के बावजूद, इस पर्व को पूरे देश में कलंकित चांद को देखने से बचाने के लिए मनाने का अनुष्ठान नहीं होता, लेकिन मिथिला में लोग इसे धैर्य से मनाते हैं और चांद को आदरपूर्ण तरीके से पूजते हैं।

मिथिला का यह लोकपर्व अब देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया है, जिससे लोगों की जिज्ञासा भी बढ़ गई है। लोग इस पर्व के पीछे के कारणों को जानने की इच्छा रखते हैं। इस तरह के लोकपर्व ने छठ की तरह ही प्राकृतिक पूजक पर्व के रूप में अपनी जगह बनाई है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनी संस्कृति के लिए मिथिला को जाना जाता है, और यहां के लोग अपने परंपराओं को महत्व देते हैं। यहां के लोग अपने परंपराओं को आज भी महत्वपूर्ण मानते हैं, और इसे धर्मनिरपेक्षता के साथ अपनाते हैं। चौरचन जैसे लोकपर्व के अवसर पर व्रती बनने के लिए न किसी पंडित की आवश्यकता होती है और न किसी विशेष मंत्र या विधान की। यहां परंपराएं सभी जाति, लिंग, और कर्मकांड से परे हैं, और महिला और पुरुष दोनों इसे आदरपूर्ण तरीके से मनाते हैं, चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं।

चौरचन में पकवानों का विशेष महत्व होता है। भादों की चौथी तिथि को मिथिला के हर आंगन में सुबह से ही पकवानों का तैयारी काम शुरू हो जाता है। इस दिन पकवान खाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, और इसलिए समाज में कोई भी इससे वंचित नहीं रहता, इसलिए पकवानों को सभी के बीच बाँटने की परंपरा होती है। पूरे दिन लोग घरों में पकवान तैयार करते हैं, और आसपास के घरों में भी पकवान भेजते हैं। दिनभर, घर के प्रमुख महिला या पुरुष व्रत रखकर चांद के उदय होने की प्रतीक्षा करते हैं। जब चांद उगता है, तो घर की बड़ी आदि, माताजी, या पूजा करने वाली स्त्री हाथ में खीर-पूड़ी लेकर कहती हैं, “उगा हो चांद, लपकला पूरी…”

चांद के कलंकित होने की कहानी पुराणों में है। यह कथा गणेश के साथ जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार, गणेश एक दिन रास्ते में फिसलकर गिर गए, और उनके शरीर को देखकर चंद्रमा हंस पड़े। चंद्रमा, जो खुद को बहुत ही सुंदर समझता था, गणेश से हंस कर कहा कि आज के दिन जो भी तुझे देखेगा, उस पर कलंक लगेगा और श्राप दिया कि उसका चेहरा शील हो जाएगा। कहा जाता है कि इस श्राप के कारण श्रीकृष्ण भी चंद्रमा के कलंक से प्रभावित हुए और उन्हें दिव्य मणि चुराने का झूठा आरोप झेलना पड़ा। चंद्रमा को इस दिन कलंकित होने का श्राप दिया गया था, इसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण तक पर कलंक लगा, और इसके कारण मिथिलावालों ने कलंकमुक्ति पर्व के रूप में इसे मनाना शुरू किया।

1568 में, मिथिला के राजा हेमांगद ठाकुर पर कर चोरी का आरोप लगा था, और उन्हें कैद में डाल दिया गया। हेमांगद ठाकुर ने ग्रहणों की गणना करके सूर्य और चंद्र ग्रहण की तिथियों को बताई थी, और इसके बाद उन्हें कैद में रख दिया गया। इसके बाद, एक पहरी ने हेमांगद के ग्रहणों के चित्र देखकर बताया कि वे सही हैं और बादशाह को इसे स्वीकार करना पड़ा। हेमांगद ने चंद्रग्रहण की भविष्यवाणी की थी और वो सही थी, जिससे उन्हें बादशाह ने बरी कर दी और उन्हें करों से मुक्ति दिलवा दी।

रानी हेमलता ने चंद्र पूजन की परंपरा की शुरुआत की और यह परंपरा लोगों के बीच पूरी तरह से फैल गई। मिथिला के लोग हर साल चांद पूजने के दिन पकवान तैयार करते हैं और इसे अपने आसपास के घरों में भेजते हैं। इस प्रकार, चांद पूजने की यह परंपरा चतुर्थी चन्द्र की पूजा के रूप में मनाने लगी, जिसे लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है।

राजा हेमांगद ठाकुर ने इसे लोकपर्व के रूप में मान्यता दी और मिथिला के लोग इसे हर साल मनाने लगे।

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